Friday, April 23, 2021
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देव का प्राचीन सूर्य मंदिर नक्काशी उत्कृष्ठ शिल्प कला का अद्भुत उदाहरण है

बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले में देव नामक स्थान पर एक मंदिर स्थित है। इसे देव सूर्य मंदिर, देवार्क सूर्य मंदिर या केवल देवार्क के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है। यह मंदिर अन्य सूर्य मंदिरों की तरह पूर्वाभिमुख न होकर पशिच्माभिमुख है। यह मंदिर अपनी अद्भुत शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। इतिहासकार इस मंदिर के निर्माण का समय छठी से आठवीं सदी के मध्य होने का अनुमान लगाते हैं। जबकि अलग-अलग पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसे त्रेता युग अथवा द्वापर युग के मध्यकाल में निर्मित किया गया था। बताया जाता है कि यहाँ के मंदिरों में पत्थरों को तराश कर बनाये गए नक्काशी उत्कृष्ट शिल्प कला के नमूने हैं।

देव सूर्य मंदिर
दण्डवत द्वार देव सूर्य मंदिर

देव सूर्य मंदिर का पौराणिक इतिहास

इस सूर्य मंदिर के इतिहास को देखें तो परम्परागत रूप से इसे हिन्दू मिथकों में वर्णित, कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा निर्मित बारह सूर्य मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर के साथ साम्ब की कथा के अलावा, यहाँ देव माता अदिति ने पूजा की थी। मंदिर को लेकर एक कथा भी है। प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों से युद्ध के दौरान सभी देवता हार गए थे। तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की अराधना की थी। तब प्रसन्न होकर माता ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। कुछ ही दिनों बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूपी आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों को परास्त कर देवताओं को विजय दिलायी। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठीदेवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

देव सूर्य मंदिर
देव सूर्य मंदिर

पुरुरवा एल और शिवभक्त राक्षसद्वय माली

सुमाली की अलग-अलग कथाएं भी जुड़ी हुई हैं जो इसके निर्माण का अलग-अलग कारण और समय बताती हैं। एक अन्य विवरण के अनुसार देवार्क को तीन प्रमुख सूर्य मन्दिरों में से एक माना जाता है, अन्य दो लोलार्क और कोणार्क हैं। मंदिर में सामान्य रूप से पुरे वर्ष श्रद्धालु पूजा हेतु आते रहते हैं। लेकिन यहाँ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर मनाये जाने वाले छठ पर्व के अवसर पर भारी भीड़ लगती है। यहाँ प्रत्येक दिन श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है पर खास कर रविवार को यहाँ दूर-दूर से भक्त हवन और पूजन करने हेतु आते रहते हैं। यहाँ भक्तों का मानना है कि आज तक इस मन्दिर से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटा और अपने मनोवांछित फल को अवश्य प्राप्त किया।

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देव सूर्य मंदिर की खास बातें

इस मंदिर की खास बात यह है कि यह विश्व का एकमात्र पश्चिमाभिमुखी मंदिर है। देव मंदिर में सात रथों की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयांचल सूर्य, मध्यांचल सूर्य और अस्तांचल सूर्य के रूप में विद्यमान है। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदहारण है। इसे बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किये आयताकार, वर्गाकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और अकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है। जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता चलता है।

देव सूर्य मंदिर
स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदहारण

इस मंदिर की कहानी सूर्य पुराण में भी मिलता है

सूर्य पुराण के अनुसार ऐल नाम के एक राजा थे, जो किसी ऋषि के श्रापवश श्वेत कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। एक बार वे शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचे। वहाँ वे राह भटक गए। राह भटके, भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पड़ा। उसके किनारे वे पानी पीने गए। पानी पीते ही वे यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी गिरा उन जगहों से श्वेत कुष्ठ के दाग गायब हो गए। यह देखकर वह अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित रह गए। इसी तरह उनके शरीर से सारे दाग हट गए। ख़ुशी के कारण राजा ने रात्रि में वहीं विश्राम करने का निर्णय लिया। रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि उसी सरोवर में भगवान सूर्य की प्रतिमा दबी पड़ी है। भगवान ने उस प्रतिमा को निकालकर वहीं मन्दिर का निर्माण करवाने और उसमें प्रतिष्ठित करने का निर्देश दिया। कहा जाता है कि राजा ऐल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया। लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहीं है। वर्तमान में जो मूर्ति है वह प्रचीन अवश्य है, लेकिन ऐसा लगता है मानो बाद में स्थापित की गई हो।

रथ यात्रा

रथ यात्रा देव सूर्य नगरी देव में सर्वप्रथम 2018 में सूर्य सप्तमी के दिन आरंभ हुआ था।इस यात्रा में भगवान सूर्य की भव्य प्रतिमा को पूरे देव में घुमाया जाता है। इस दिन हजारों श्रद्धालु माथे पर कलश लिए भ्रमण करते है। यह रथ यात्रा सूर्य मंदिर, बाजार, गोदाम पर, सूर्यकुंड तालाब, बरई बिगहा से होते हुए सूर्य मंदिर के पास पहुंचकर समाप्त होता है।भगवान सूर्य के प्रति श्रद्धालुओं की भक्ति देखते बनती है। सूर्य रथ यात्रा की ऐतिहासिकता व भव्यता को देखने व भगवान भास्कर के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। चारों ओर भगवान भास्कर के जयकारे लगते है। देव की रथ यात्रा सन 2019 से देव में कार्य कर रहे संस्था एवम शहरवासी के द्वारा आयोजित किया जाता है।

देव सूर्य महोत्सव

देव सूर्य महोत्सव के नाम से विश्व प्रसिद्ध सूर्य जन्मोत्सव 1988 से लगातार प्रशासनिक स्तर पर दो दिनों तक आयोजित किया जाता है। यह प्रत्येक वर्ष सूर्य देव के जन्म के अवसर पर मनाया जाता है। इसे बसंत पंचमी के दूसरे दिन अर्थात सप्तमी को पूरे शहर वासी नमक को त्याग कर बड़े ही धूम धाम से मनाते हैं। इस दिन के अवसर पर कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। इस दिन देव के कुंड अर्थात ब्रह्मकुंड में भव्य गंगा आरती भी होती है। जिसे देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। इसी दिन देव शहर वर्ष की पहली दिवाली मानती है। इस दिन रात्रि में संस्कृति कार्यक्रम का भी आयोजन किया जाता है।

कैसे पहुँचे

सड़क द्वारा

यह पटना से लगभग 160 कि.मी. दूर है। पटना से NH-98 से बिक्रम, अरवल, दाउदनगर, ओबरा, औरंगाबाद होते हुए यहाँ जाते हैं।

ट्रेन द्वारा

यहाँ पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन अनुग्रह नारायण रोड है। वहाँ से देव लगभग 20किलोमीटर दूर है।

वायुयान द्वारा

यहाँ पहुंचने के लिए पटना हवाई अड्डा आइये। फिर वहाँ से ट्रेन, बस या प्राइवेट टैक्सी से देव जाया जा सकता है।

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