Saturday, March 6, 2021
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पढ़िए लेखनी से समाज को आईना दिखाने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के बारे में।

बिहार राज्य का नाम जेहन में आते हीं कई महापुरुषों की तस्वीर उभर आती है। वे भारत में ही नहीं परन्तु पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। यहाँ कई महान पुरुषों ने जन्म लिया। उन्हीं में से एक हैं रामधारी सिंह दिनकर जी जो हिंदी के प्रसिद्ध कवि, लेखक एवं निबंधकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में भी जाने जाते है। वे स्वतंत्रता के पहले एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए लेकिन स्वतन्त्रता के बाद ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में जाने गए। उन्हें छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी माना जाता है। उनकी कविताएँ क्रांतिकारी, विद्रोह, क्रांति की पुकार है, तो वही दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। 

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बचपन

हिंदी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. में सिमरिया, बेगूसराय में हुआ। उनका जन्म एक सामान्य किसान रवि सिंह एवं उनकी पत्नी मनरूप देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। उनके पिता एक साधरण किसान थे। दिनकर जब दो साल के थे, जब उनके पिता का देहांत हो गया और घर की सारी जिम्मेवारियाँ उनकी विधवा माँ के ऊपर आ गई। उनका पूरा बचपन गाँव में बीता, जहाँ के प्रकृति का प्रभाव उनके मन में बस गया। उनके जीवन पर वास्तविक कठोरताओं का भी गहरा प्रभाव पड़ा। वे एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से सराबोर कवि के रूप में जाने जाते थे। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते है।

शिक्षा:-

रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की एवं निकटवर्ती बोरो नामक ग्राम में राष्ट्रीय मिडिल स्कूल जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विरोध में खोला गया था, जिसमें उन्होंने प्रवेश प्राप्त किया। यहीं से इनको मनो मस्तिष्क में राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा। हाई स्कूल की शिक्षा उन्होंने मोकामा घाट हाई स्कूल से प्राप्त की और इसी बीच इनका विवाह भी हो गया। 1928 में मैट्रिक के बाद वे पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास से बी.ए. ऑनर्स किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का भी खूब अध्ययन किया।

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पद और सेवा

रामधारी सिंह दिनकर बी.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय के अध्यापक हुए। उन्होंने 1934 से 1947 तक बिहार की सेवा में सब-रजिस्टर और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1947 में देश स्वाधीन हुआ और वे बिहार विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुजफ्फरपुर आए। 1952 में जब भारत के प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राजयसभा का सदस्य के रूप में चुना गया जिसके बाद वे दिल्ली आ गए। वे 12 वर्ष तक संसद के सदस्य रहे और उसके बाद उन्हें 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। पर अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 तक अपना हिंदी सलाहकार नियुक्त किया और वे पुन: दिल्ली लौट आए।

उनके प्रथम प्रमुख तीन काव्य-संग्रह

• रेणुका- ‘रेणुका’ (1932 ई.) में अतीत के गौरव के प्रति कवि का सहज आदर और आकर्षक छवि देखने को मिलता है

परन्तु साथ ही वर्तमान परिवेश की नीरसता से पीड़ित मन की वेदना का भी परिचय मिलता है।

• हुंकार- हुंकार (1938 ई.) में कवि ने अतीत के गौरव-गान की अपेक्षा वर्तमान दैत्य के प्रति आक्रोश प्रदर्शन की ओर अधिक उन्मुख है।

• रसवंती- रसवंती (1939 ई.)में कवि की सौन्दर्यान्वेषी वृत्ति काव्यमयी हो जाती है। परन्तु यह अँधेरे में ध्येय सौंदर्य का अन्वेष नहीं, उजाले में ज्ञेय सौंदर्य की आराधना है।

सामधेनी- सामधेनी (1947 ई.) में रामधारी सिंह दिनकर की समाजिक चेतना, स्वदेश प्रेम और परिचित परिवेश की परिधि से बढ़कर विश्व वेदना उद्धृत मालूम पड़ती है। कवि के स्वर का ओज नए वेग से नई ऊंचाई तक पहुँचता है।

काव्य रचना:-

रामधारी सिंह दिनकर ने अनेक प्रबंध काव्यों की रचना की है, जिनमें कुरुक्षेत्र (1946), रश्मिरथी (1952) और उर्वशी (1961) प्रमुख हैं। 1955 में नीलकुसुम इनके काव्य में एक मोर बनकर सामने आया। यहाँ वे काव्यात्मक प्रयोगशीलता के प्रति आस्थावान है। हिंदी साहित्य क्षेत्र में एक ओर जहाँ उनकी कटु आलोचना की गई लेकिन दूसरी ओर अपनी रचनाओं से राष्ट्रकवि भी बने। काव्य-नाटक को उनकी कवि-प्रतिभा का चमत्कार माना गया। कवि ने इस वैदिक मिथक के माध्यम से भगवान व मनुष्य, स्वर्ग व पृथ्वी, अप्सरा व लक्ष्मी और काम अध्यात्म के संबंधों का अद्भुत विश्लेषण किया है।

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पुरस्कार व सम्मान:-

रामधारी सिंह दिनकरजी को उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिए काशी में प्रचारित सभा, उत्तरप्रदेश सरकार एवं भारत सरकार द्वारा सम्मान मिला। 1959 में उन्हें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें संस्कृति के चार अध्याय के लिए 1959 में ही साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। उन्हें राष्ट्रकवि के उपनाम से नवाजा गया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राजयपाल जाकिर हुसैन ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। 1968 में उन्हें राजस्थान विधापीठ ने साहित्य-चूरामणि से सम्मानित किया। काव्य रचना उर्वशी के लिए उन्हें 1972 में ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।

रामधारी सिंह दिनकर जी ने 24 अप्रैल 1974 को चेन्नई में अपना प्राण त्यागा। इसके साथ हिन्दी साहित्य के इस अमर पुरोधा ने अपनी कई कृतियों को रचकर संसार को सदा के लिए अलविदा कह गए।

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